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संविधान का अर्थ संविधान की परिभाषा,संविधान के प्रकार, संविधान की विशषतांए एवं लक्षण, संविधान के आवश्यक तत्व या गुण, संविधान का महत्व,

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"Knowledge with Ishwar"


संविधान का अर्थः- 


संविधान शब्द अंग्रेजी के ’’कांस्टीट्युश्न’’ "Constitution" शब्द का हिंदी रूपांतरण है। ’’कांस्टीट्युशन’’ शब्द का अर्थ होता है शरीर का गठन या’ढांचा’। उसी प्रकार संविधान किसी देश का सर्वेसर्वा व ढांचा होता है। किसी भी देश का संविधान उस देश की राजनीतिक व्यवस्था का बुनियादी ढांचा होता है। संविधान में शासन क तीनों अंगों कार्यपालिका, न्यायपालिका, व्यवस्थापिका इनकी शक्तियॉ, रचनांए, कार्यें, दायित्वों आदि का वर्णन साथ ही नागरिको के अधिकार और कर्तव्य, स्वतंत्रता, समानता, सामाजिक न्याय आदि का उल्लेख होता है। संविधान को किसी भी देश की राजनीतिक व्यवस्था की आत्मा कहा जाता है। 


’’किसी देश का शासन जिन मुलभुत नियमों एवं कानूनों के अनुसार चलाया जाता हैं उनकें संकलित प्रलेख को संविधान कहतें हैं।’’    

            

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  संविधान की परिभाषाः- 


1. गेटल महोदय क शब्दों में- ’’वे मौलिक सिद्धांत जिनकें द्वारा किसी राज्य का स्वरूप निर्धारित होता है, उसे संविधान कहतें हैं।’’


2. गिलक्राइस्ट के अनुसारः- ’’संविधान उन समस्त लिखित और अलिखित विधियों और नियमों का संग्रह है, जिनके आधार पर किसी देश की शासन व्यवस्था संगठित की जाती है, शासन के विभिन्न अंगों के बीच शक्ति का विभाजन किया जाता हैं, जिन पर उन शक्तियों का प्रयोग किया जायेगा।’’


3. अरस्तु के अनुसार- ’’ संविधान राज्य के कार्यों तथा नागरिकों के अधिकारों को निश्चित करता है।’’


4. जेलिनेक के शब्दो में- ’’संविधान उन कानूनी नियमों का संग्रह है, जिनके द्वारा उनकी रचना की विधी, उनके पारस्परिक संबंधों, उनके कार्यक्षेत्र  तथा राज्य के संबंध में उनमें प्रत्येक के मौलिक स्थान का निश्चय किया जाता है।’’


5. ऑग और जिंक के अनुसार- ’’संविधान वह आधारभूत कानून है, जिसमें सरकार के स्वरूप का उल्लेख होेता है, उसके विविध अंगों के बीच संबंधों, सरकार तथा नागरिकों के बीच संबंधों का निरूपण किया जाता है तथा नागरिकों के मुलभूत अधिकारों का उल्लेख किया जाता है।


6.ब्राइस महोदय के अनुसार- ’’संविधान ऐसे निश्चित नियमों का संग्रह होता है जिसमें सरकार की कार्यविधी प्रतिपादित होती है और जिनके द्वारा उसका संचालन होता है।’’


7.एल्बर्ट डाइसी के शब्दो मेें- ’’संविधान में वे सब कानून सम्मिलीत होते हैं जिनका प्रभाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राज्य में संप्रभु शक्ति के वितरण अथवा उसके प्रयोग पर पड़ता है।’’


8. हरमन फाइनर के अनुसार- ’’ संविधान आधारभूत राजनीतिक संस्थाओं की व्यवस्था होती है।’’


9. गार्नर के अनुसार- ’’संविधान राज्य के अनन्य सार्वजनिक कानून के अधिक अनिवार्य अंगों को समाहित करता है।


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संविधान के प्रकारः-


संविधान को मुख्य रूप से तीन भागों में बंाटा गया है।


1. उत्पति के आधार पर- (1) विकसित संविधान 

 (2) निर्मित संविधान


2. परंपराओं एवं विधीयों के अनुपात के आधार पर- (1) लिखित संविधान (2) अलिखित संविधान


3. संशोधन करनें की प्रक्रिया के आधार पर-(1) लचिला या परिवर्तनशील संविधान (2) कठोर या अपरिर्वनशील संविधान


उत्पति के आधार पर:-


1. विकसित संविधानः- विकसित संविधान उस संविधान को कहते हैं जिसका निर्माण करने के लिए किसी संविधान सभा का गठन नहीं किया जाता है और नही यह किसी संविधान सभा द्वारा निर्मीत किया हुआ होता है वरन् विकसित संविधान का निर्माण तथा इसे बनने का कोई निश्चित समय नहीं होता है। विकसित संविधान क्रमिक विकास का ही परिणाम होता है। इसका निर्माण धीरे धीरे होता है। ब्रिटेन का संविधान इसका उत्तम उदाहरण है।


2. निर्मीत संविधानः- निर्मीत संविधान से आश्य उस संविधान से होता है जिसका निर्माण करने के लिए किसी संविधान सभा का गठन किया गया हो तथा उस संविधान सभा द्वारा संविधान का निर्माण किया गया हो। निर्मीत संविधान एक निश्चित अवधि में निर्मीत होता है। तथा निर्मीत संविधान अधिकांशतः लिखित ही होता है। अमेरिकी संविधान विश्व का प्रथम निर्मित संविधान है।भारत तथा रूस का संविधान निर्मीत संविधान का उत्तम उदाहरण है।


परंपराओ एवं विधीयों के आधार परः-


1. अलिखित संविधानः- अलिखित संविधान उस संविधान को कहा जाता है। जिसके मुल तत्व लेखबद्ध नही होते है अथवा बहुत कम लिखीत अवस्था में होते हैं। इस संविधान के अधिकंशत तत्व रूढियों व प्रथाओं के रूप में प्रचलन में होते हैं। अलिखित संविधान के स्त्रोत न्यायिक निर्णय, विभिन्न समझौते तथ विद्वानों की टिप्पणीयां आदि होते हैं। इंग्लैड विश्व का एकमात्र अलिखित संविधान हैं।


2.लिखित संविधानः- लिखित संविधान उस संविधान को कहा जाता है जो पूर्ण रूप से लेखबद्ध होता है। जिसका निर्माण किसी संविधान सभा द्वारा किया गया हो। लिखित संविधान किसी भी देश की न्याय व्यवस्था का पवित्र लेख होता है। इसमें शासन से संबंधित अधिकांश बाते लिपीबद्व कर ली जाती है। भारत का संविधान लिखित और निर्मीत संविधान है।


संशोधन करने की प्रक्रिया के आधार परः-


1. लचिला और परिवर्तनशील संविधानः-लचिला या परिवर्तनशील संविधान उस संविधान को कहा जाता है जिसे किसी संकटकाल में या विषम परिस्थिति में आसानी से परिवर्तीत किया जा सकें। इस संविधान में संसद मे सामान्य बहुमत के आधार पर परिवर्तन किया जा सकता है। तथा यह देश के अनुकूल तथा ंिस्थति के अनुसार परिवर्तन करनेे में सक्षम होता है।                      


2. कठोर या दुष्परिवर्तनशील संविधानः- कठोर या दुष्परिवर्तनशील संविधान उस संविधान को कहा जाता है जिसमें परिवर्तन करना कठिन होता हैं। इसे संकटकाल मे या विषम परिस्थिति मे आसानी से परिवर्तीत नहीं किया जा सकता है। कठोर संविधान अधिकांशतः लिखित या लेखबद्ध होते हैं। और संविधान एक पवित्र लेख होता है। जिसमें इस पवित्र लेख में परिर्वन करना कठीन है। कठोर संविधान में संशोधन करने के लिए संसद में 2/3 बहुमत की आवश्यकता होती है। तथा सामान्य कानून का निर्माण संसद में सामान्य बहुमत के आधार पर किया जा सकता है। 

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आदर्श संविधान के लक्षण या विशेषताः- 


आदर्श संविधान वह संविधान कहलाता है जो हर परिस्थिति में वहां के नागरिकों के द्वारा सम्मानीय होता है एवं परिस्थिति के अनुसार निर्णय करने की क्षमता रखता हो।


1. स्वतंत्र न्यायालयः- न्यायालय राज्य के नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने वाला होता है। संविधान में स्वतंत्र न्यायालय होने चाहिए। जिन पर किसी भी प्रकार को कोई दबाव नहीं होना चाहिए। जो व्यक्तियो को निडर होकर न्याय दिलाता हो।


2. स्पष्टता एंव निश्चितताः- संविधान स्पष्ट एवं निश्चित होना चाहिए। जिसे कोई भी समान्य व्यक्ति आसानी से समझ सके। संविधान की भाषा कठीन नहीं होनी चाहिए।


3. व्यापकताः- संविधान को व्यापक होना चाहिए। व्यापक से आश्य संविधान के विस्तृत होने से नहीं अपितु संविधान में उन सभी बातो, तत्वो का समावेश होना चाहिए। संविधान अल्प समय के लिए नहीं अपितु दिर्घकाल का होता है।


4. शासन व्यवस्थाः- संविधान मे शासन की संपूर्ण व्यवस्था का विस्तृत विवरण होना चाहिए। 


5. संक्षिप्तताः- संविधान को आवश्यक रूप से संक्षिप्त भी होना चाहिए जिससे संविधान का अध्ययन आसानी से किया जा सके और संविधान को लघु कथा के जेसे पढा जा सके ऐसे संविधान को पढने में लोगों की रूचि होती हैं।


6. समयानुकूलताः-  एक अच्छे संविधान की एक विशेषता यह भी है कि संविधान में परिस्थिति के अनुरूप परिवर्तन करने की क्षमता होनी चाहिए। ऐसे संविधान में नागरिकों का विश्वास होता है।


7. नागरिकों के अधिकारों एवं कृतव्यों का विवरणः- एक अच्छे संविधान की विशेषता यह होती है कि इसमें नागरिकों के अधिकारों एवं कृतव्यों का विस्तृत विवरण होता हैं।


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एक आदर्श संविधान के आवश्यक तत्व अथवा गुणः-


1. निश्चितताः- एक आदर्श संविधान का यह गुण होता है कि यह आसानी से किसी भी व्यक्ति को समझ मे आ जाना चाहिए है। संविधान को समझाने के लिए किसी अधिवक्ता या विद्वान व्यक्ति की आवश्यकता न पड़ती हो। संविधान की भाषा सरल होनी चाहिए जिस पर प्रथम दृष्टि पड़ते ही अर्थ समझ में आ जाये।


2. व्यापकताः-एक अच्छे व आदर्श संविधान का यह गुण होता है कि इसमें सभी मुख्य तत्वों, तथ्यों व बातों का समावेश हो जाना चाहिए।


3. स्पष्टताः- एक आदर्श संविधान का यह गुण होता है कि इसकी भाषा सुगम व सरल होती है। संविधान बनाते समय संविधान निर्माताओं को इस बात का ध्यान रखना चाहिए की इसमे क्लीष्ट शब्दों का प्रयोग न हो। क्लीष्ट व कठीन शब्दो से एक सामान्य व्यक्ति के लिए संविधान के तथ्यों का अर्थ निकालना मुश्किल होता है तथा अधिवक्ता, न्यायाधिश और संसद के विद्वान इसका मनमाना अर्थ न निकाल सके।


4. सूक्ष्मताः- ’’सुक्ष्मता संविधान का प्राण है।’’ एक अच्छे संविधान को सुक्ष्म भी होना चाहिए जिससे इसे पढनें में लोगो की रूचि हो। 


5. समयानुकुलता या परिवर्तनशीलताः- एक अच्छे संविधान में परिवर्तनशीलता होनी चाहिए। अर्थात संविधान ऐसा होना चाहिए जिससे वह संकटकाल में व अन्य विकट परिस्थिति में आवश्यकतानुसार परिवर्तन कर सके।


6. प्रस्तावनाः- संविधान में प्रस्तावना होनी चाहिए। यह जनता के आदर्शों और उनकी इच्छाओं की अभिव्यक्ति करती हैं। प्रस्तावना को संविधान का प्राण और संविधान की कुॅजी भी कहा जाता है। 


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संविधान का महत्वः-


1. अधिकारों क रक्षकः- संविधान नागरिको के अधिकारों का रक्षक होता हैं। नागरिकों के अधिकारों के हनन पर संविधान नागरिकों के हितों का संरक्षण करता है।


2. शासन के अंगों के कार्यों का विभाजन:- शासन के तीनों अंगों कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका आदि की शक्तियों, अधिकारो व कर्तव्यों, रचना आदि के आधार पर कार्य विभाजन करता है। संविधान के अनुसार ही शासन का संचालन होता है।


3. निरंकुशता पर नियंत्रणः- संविधान सरकार की निरंकुशता पर नियंत्रण लगाता है तथा सरकार वही कार्य कर सकती है जिसको करने के लिए संविधान उसको अनुमति देता है।


4. सुव्यवस्थित शासनः- शासन को सुव्यवस्थित संचालन करनें के लिए संविधान का होना आवश्यक शर्त है। संविधान के द्वारा ही सुव्यवस्थित शासन स्थापित किया जा सकता है।


5. व्यक्ति  के व्यक्तित्व का निर्माणः- संविधान किसी भी देश और वहां के नागरिकों के बीच संबंधों का निर्धारण करता है।


6. लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापनाः- संविधान के द्वारा ही लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करनें का प्रयास किया जाता है। संविधान सबका साथ सबका विकास आदि पर बल देता है। तथा सभी नागरिकों के आर्थीक विकास के प्रयोजन से विकास कार्यक्रम कार्यान्वित करता है।


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