भारतीय संविधान की परिभाषा, भारतीय संविधान सभा का गठन, भारतीय संविधान के स्त्रोत, भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषतांए।
bhartiya samvidhan ka arth avn paribhasha
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भारतीय संविधानः-
भारत का संविधान बनाते समय संविधान के निर्माताओं ने इसमें विश्व के सर्वोत्तम लक्षणों को एकत्रित कर अपने देश की आवश्यकता व विद्यमान दशाओं के अनुरूप उसे अंगीकृत किया। भारतीय संविधान का निर्माण संविधान द्वारा किया गया है। भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा संविधान है।
संविधान सभा का गठनः-
वह सभा जिसे किसी देश के संविधान का निर्माण करनें का कार्यभार सौंपा गया हो। उसे संविधान निर्मात्री सभा कहा जाता है।
भारत के संविधान का निर्माण करने के लिए संविधान सभा का गठन 1946 की केबिनेट मिशन योजना रही। संविधान निर्माण की अवधि एवं संविधान लागू होने तक भारतीय शासन अधिनियम,1935 के अनुसार देश का शासन संचालित होता रहा। संविधान सभा में 398 सदस्य थे । संविधान सभा की प्रथम बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई। इस सभा का अस्थायी अध्यक्ष सच्चिदानंद सिन्हा को बनाया गया। संविधान सभा की दूसरी बैठक 11 दिसंबर 1946 को संपन्न हुई। इस बैठक में डॉ राजेन्द्र प्रसाद को स्थायी अध्यक्ष चुना गया। संविधान सभा के द्वारा संविधान का निर्माण करनें मे 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन का समय लगा। इस अवधि में 11 अधिवेशन तथा 166 बैठकें हुई। भारतीय संविधान को 26 नवंबर 1946 को अंगीकृत किया गया। आखिरकार संविधान को 26 जनवरी 1950 से पूर्णतः लागू कर दिया गया। जिस दिन संविधान को लागू किया गया उसे आज गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारतीय संविधान सभा में बी. एन. राऊ प्रमुख संवैधानिक सलाहाकार थे।
ध्यान देने योग्य बातेंः-
1. भारतीय संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष- डॉ राजेन्द्र प्रसाद
2. भारतीय संविधान सभा के अस्थायी अध्यक्ष- डॉ सच्चिदानंद सिन्हा
3. भारतीय संविधान सभा के प्रारूप समिती के सभापति/ अध्यक्ष- डॉ भिमराव अम्बेडकर
4. संविधान की आत्मा या कुॅजी कहा जाता है- प्रस्तावना को
5. भारतीय संविधान सभा के संवैधानिह सलाहाकार- बी.एन. राऊ
6. संविधान बनकर तैयार होने के अवधि- 2 वर्ष 11 माह 18 दिन
7. संविधान में कुल कितने अधिवेशन तथा बैठकें हुई- 11 अधिवेशन और 166 बैठकें।
8. गणतंत्र दिवस मनाया जाता है- 26 जनवरी को
9. संविधान पूर्ण रूप में लागु हुआ- 26 जनवरी 1950 को
10. संविधान को अगीकृत किया गया - 26 नवबंर 1949 को
11. संविधान बनानें में कुल व्ययः-6.4 करोड (उस समय में)
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भारतीय संविधान सभा के सदस्यों के नामः-
भारतीय संविधान का निर्माण करने वाली संविधान सभा में डॉ राजेन्द्र प्रसाद, डॉ भीमराव अम्बेडकर, बी. एन. राऊ, डॉ सच्चिदानंद सिन्हा, पं. जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सरदार बल्देव सिंह, सरोजनी नायडु, के. एम. मुंशी, विजया लक्ष्मी पंडित।
साथ ही मध्यप्रदेश से संविधानर सभा में ठा. लालसिंह, सेठ गोविंद दास, पं. रविशंकर शुक्ल, हरिविष्णु कामथ, घनश्याम सिंह गुझ, गोपीकृष्ण विजयवर्गीय, राधावल्लभ विजयवर्गीय आदि प्रमुख थे।
प्रारूप समिती के सदस्यः- प्रारूप समिती में डॉ भीमराव अम्बेडकर, एन. गोपालस्वामी आयंगर, अल्लादी कृष्णा स्वामी अय्यर, सैय्यद मोहम्मद सादुल्ला, के. एम. मुशी, बी.एल. मीतर, डी.पी. खेतान आदि थे बाद में श्री मित्तर व खेतान के स्थान पर एन. माधवन रावॅ व टी. टी. कृष्णामाचारी आदि को पद सौंपा गया ।
संविधान के सुचारू रूप से निर्माण के लिए संविधान सभा द्वारा समितीयों का निर्माण किया गया।👇नीचे दी गई समितीयों की लिंक पर क्लिक कर जानें कौनसी समितीयॉ व उनके कौन अध्यक्ष थे।
संविधान सभा की प्रमुख समितियां ओर उनके अध्यक्ष
संविधान के प्रमुख स्त्रोतः- संविधान का निर्माण करने के लिए संविधान के विशेष संवैधानिक सलाहाकर बी. एन.राऊ ने कई देशों का भ्रमण किया और वहां के संविधान के विस्तृत गहन अध्ययन भारत के संविधान सभा के विद्वानों द्वारा किया गया तथा उन देशों के संविधान से प्रमुख तथ्यों को संग्रहित किया गया तथा इसे संविधान में अंतरित किया गया व महत्वूर्ण बातों का समावेश किया गया। कई देशों से संविधान के तथ्यों को लेने के कारण कई वि़द्वान भारत के संविधान को ’’उधार का थैला’’ कहा है।
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संविधान के प्रमुख स्त्रोतः-
1. 1935, का शासन अधिनियमः- भारतीय संविधान का लगभग 2/3 प्रतिशत भाग भारतीय शासन अधिनियम 1935 से लिया गया है। भारतीय शासन अधिनियम 1935 मे से संघात्मक व्यवस्था, न्यायपालिका की शक्तियॉ, लोक सेवा आयोग आदि तत्व को लिया गया है।
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2. दूसर देशों के संविधान के प्रमुख स्त्रोतः-
(1) संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से प्राप्त प्रावधानः- भारत के संविधान में संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से मौलिक अधिकार, सर्वोच्च न्यायालय, न्यायिक पुनरावलोकन एवं संविधान की सर्वोच्चता, उपराष्ट्रपति का पद आदि तथ्यों का समावेश किया गया है।
(2) जर्मनी का वाइमर संविधानः- जर्मनी के संविधान से राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियॉ आदि तथ्यों का समावेश संविधान में किया गया है।
(3) कनाडा का संविधानः- कनाडा के संविधान से संघात्मक व्यवस्था, अवशिष्ट केंद्र आदि तथ्यों व प्रावधानों का समावेश किया गया हैं।
(4) आस्ट्रेलिया का संविधानः- आस्ट्रेलिया के संविधान से संविधान की उद्देशिका या प्रस्तावना की भाषा, समवर्ती सूची आदि बातो को भारतीय संविधान में समावेश किया गया है।
(5) आयरलैंड का संविधानः- राज्य के नीति निदेशक तत्व। सदस्यों का मनोनयन, राष्ट्रपति के निर्वाचन में निर्वाचक मंडल की व्यवस्था आदि बातो का समावेश किया गया है।
(6) दक्षिण आफ्रिका का सविधानः- दक्षिण आफ्रिका के सविधान से संविधान में संशोधन की प्रक्रिया को सम्मिलित किया गया है
(7) जापान का संविधानः- जापान के संविधान से विधि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया आदि बातो को भारतीय संविधान में सम्मिलित किया गया है।
(8) सोवियत संघ का संविधानः- भारतीय संविधान में मुल कर्तव्यों का समावेश सोवियत संघ के संविधान के द्वारा किया गया हैं।
(9) फ्रांस का संविधानः- भारतीय संविधान में गणतंत्र की स्थापना का समावेश फ्रांस के संविधान के द्वारा किया गया है।
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भारतीय संविधान की विशेषतांएः-
1. लिखित एवं निर्मीत संविधानः- भारत के संविधान में 395 अनुच्छेद और 12 अनुसूचियॉ है जो 22 भागों मे विभाजित हैं। भारत के संविधान का निर्माण संविधान सभा द्वारा किया गया था। भारत का संविधान लिखित और निर्मीत संविधान है। भारत के संविधान को लेखबद्ध किया गया है।भारत का संविधान विश्व का सबसे बडा व विस्तृत संविधान है।
2. कठोर एवं लचीलेपन का मिश्रणः- भारत का संविधान कठोर एंव लचिलेपन का मिश्रण है। भारत के संविधान में संशोधन की प्रक्रिया के आधार पर सामान्य विषयों पर सामान्य बहुमत के द्वारा संशोधन किया जाता । कुछ प्रावधानों में विशिष्ट बहुमत से तथा महत्वपूर्ण विषयों पर विशिष्ट बहुमत के साथ या सदन के 2/3 बहुमत के साथ, आधे राज्यों के अनुसमर्थन से संविधान में संशोधन किया जाता है। इस प्रकार भारत का संविधान न तो अधिक लचिला है और नही इतना अधिक कठोर बल्कि दोनों का मिश्रण है।
3. संपूर्ण प्रभूत्व संपन्न गणराज्यः- भारत की एक विशेषता यह है कि भारत एक संपूर्ण प्रभूत्व संपन्न गणराज्य है। संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न गणराज्य का अर्थ यह है कि भारत एक संप्रभू राष्ट्र है। भारत अपने बाह्य व आंतरिक मामलों में अपनी इच्छानुसार आचरण कर सकता है। भारत पर किसी भी विदेशी सत्ता का कोई नियंत्रण नहीं है। भारत अपने वैदेशिक संबंधों व अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में अपनी इच्छानुसार आचरण करेगा।
4. समाजवादी एवं पंथनिरपेक्षताः- भारत के संविधान में समाजवादी एवं पंथनिरपेक्षता को जोड़ा गया है। भारत के संविधान में समाजवाद से अर्थ यह है कि भारतीय व्यवस्था समतावादी ढांचे पर आधारित है। भारत के प्रत्येक नागरिक की न्यून्तम आवश्यकताओं की पूर्ती की जायेगी तथा सभी व्यक्तियों के लिए बिना किसी भेदभाव के आर्थिक विकास का प्रयास संविधान के द्वारा किया जायेगा।
भारत एक सांप्रदायिक देश है जहां सभी धर्म संप्रदाय के लोग आपस में मिल जुलकर रहतें है। भारत के संविधान के अनुसार राज्य किसी भी धर्म या संप्रदाय को राज्य के धर्म या संप्रदाय विशेष के रूप में नहीं मानेगा। भारत किसी भी धर्म के साथ कोई पक्षपात नहीं करेगा। भारत के संविधान के अनुसार राज्य के द्वारा नागरिकों के मध्य धर्म या संप्रदाय के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा।
5. संसदीय शासन प्रणालीः- भारतीय संविधान के अनुसार भारत में संसदीय शासन प्रणाली को अपनाया गया है। संसदीय शासन प्रणाली में कार्यपालिका की वास्तविक शक्तियॉ मंत्री परषिद में निहीत होती है। भारतीय संविधान मे मंत्रीपरिषद समाुहिक उत्तरदायित्व का निर्वहन करती है। मंत्री परिषद का मुखिया प्रधानमंत्री होता है। मंत्रीमंडल की समस्त कार्यवाहियों का संचालन वही करता है। प्रधानमंत्री किसी भी मंत्री से इस्तीफा मॉग सकता है। किसी भी मंत्री के विरूद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर सभी को सामुहिक त्याग पत्र देना पड़ता हैं।
6. संघात्मक शासन व्यवस्थाः- भारत एक संघात्मक शासन व्यवस्था वाला राज्य है । भारत सघ और राज्यों में विभक्त है। भारत के संघ एवं राज्यों की शक्तियों का निर्धारण केंद्र में न करके उन्हें संध और राज्यों में विभाजित किया है संघ और राज्य दोनों अपने अपने क्षेत्र में कार्य करने के लिए स्ततंत्र होते हैं। संविधान केंद्र और राज्य के मध्य उत्पन्न विवादों का निपटारा करनें का भी प्रयास करता है।
7. स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिकाः- भारत के संविधान के द्वारा न्यायपालिका को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रूप प्रदान किया गया है। भारत की न्यायपालिका बिना किसी दबाव प्रभाव के निष्पक्ष रूप से कार्यवाही कर जनता को न्याय प्रदान कर सकती हैं। संविधान के द्वारा न्यायपालिका की निष्पक्षता के लिए न्यायधिशों की नियुक्ति, हटाये जाने की प्रक्रिया आदी बातों का स्पष्ट निर्धारण किया गया है।
8. मोलिक अधिकार एवं मूल कर्तव्यः- भारत के संविधान की एक विशेषता यह है कि इसमे नागरिको के लिए मौलिक अधिकारों की व्यवस्था की गई है। मौलिक अधिकार के द्वारा ही नागरिकों का सर्वोंगिण विकास हो सकता है। मौलिक अधिकार के साथ नागरिकों के कर्तव्यों का प्रावधान भी संविधान के द्वारा किया गया हैै। नागरिको के मौलिक अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च न्यायालय करता है। इन अधिकारों का हनन करनें पर नागरिक सर्वोच्च न्यायालय की शरण ले सकता है। इसी के साथ संविधान राज्य के प्रत्येक नागरिक से आशा करता है कि वह राज्य द्वारा प्रदान किये गये कर्तव्यों का पालन कर एक आदर्श नागरिक का परिचय देकर राज्य को सहयोग प्रदान करें। भारत के संविधान में नागरिको को 6 मौलिक अधिकार प्रदान किये गयें हैं साथ ही संविधान के 42 वें संशोधन (1976) के द्वारा 11 मुल कर्तव्य को जोड़ा गया है।
मूल कर्तव्यों के बारे मे ओर जानने के लिए यहां क्लिक करे।
9. राज्य के नीति निदेशक तत्वः- भारत के संविधान मे राज्य की नीति का निर्धारण करने वाले राज्य के नीति निदेशक तत्वों की व्यवस्था की गई है। भारतीय संविधान के चौथे भाग में शासन संचालन के लिए जिन मुलभूत सिद्धांतों का वर्णन किया गया है आमतौर पर उन्हें ही राज्य के नीति के निर्धारक तत्व कहे जाते हैं। इन तत्वों के माध्यम से राज्य में लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करनें का प्रयास किया गया है।
10 सार्वभौमिक व्यस्क मताधिकारः- भारत के संविधान में सार्वभोमिक व्यस्क मताधिकार को अपनाया गया है। जिसका अर्थ यह है कि भारत का वह प्रत्येक नागरिक जो वयस्क है 18 वर्ष की उम्र पूर्ण कर चुका है तथा मतदान करनें के योग्य है को बिना किसी जाति, धर्म, संप्रदाय, भाषा, रंग, रूप, लिंग, कर्म, क्षेत्र आदि के आधार पर बिना किसी भेदभाव के मत देने का अधिकार प्राप्त है। साथ ही सभी नागरिकों को चुनाव लडने, सभाएं करनें, राजनीतिक दल बनानें का अधिकार है।
11 इकहरी नागरिकताः- भारत के संविधान के अनुसार इकहरी नागरिकता को अपनाया गया है। इकहरी नागरिकता से आश्य यह है कि भारत का नागरिक चाहे वह किसी भी राज्य- मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, हरियाणा व अन्य सभी राज्यों में से कहीं भी निवास करता हो। वह राज्यों का नागरिक न होकर राज्य का नागरिक होता है। साथ ही भारत का नागरिक देश में कहीं भी रोजगार प्राप्त कर सकता है।
इस प्रकार भारत के संविधान कई विशेषताओं को धारण किये हुए हैं।

3 टिप्पणियाँ
बहुत ही शानदार जानकारियो से अवगत करवा रहे हो पुरोहित जी
जवाब देंहटाएंधन्यवाद आदरणीय
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया
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